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Dera Baba Murad

  जै बाबा शेरे शाह जी | जै बाबा मुराद शाह जी | जै बाबा लाडी शाह जी

 

5 साल बीत गये गुरदास जी नकोदर नहीं आये और अपने काम में व्यस्त होगये. उस समय गुरदास जी को काफी चिंता रहती थी क्योंकि उनकी पतनी मंजीत मान जी का थाइरोइड के कारण वजन बहुत बढ़ गया था. उन्होंने बहुत डॉक्टरों के पास दिखाया, हर जगह इलाज करवाया पर कोई हल ना निकला, फिर गुरदास जी के एक दोस्त दविंदर शायर ने खन्ना शहर से फ़ोन किया और बताया की वह एक बहुत पहुंचे हुए पंडित को जानता है और आप आ जाओ. गुरदास जी और मंजीत जी उस समय पटियाला रहते थे और वह अगले ही दिन खन्ना के लिए निकल गए पहुँचते ही पंडित को मिले, और पंडित ने बताया की उनपर तो राहु केतु का चक्कर है और बहुत सारे उपाय लिख दिए, फिर वह निराश होकर वापिस पटियाला जाने लगे तो गुरदास जी बोले मंजीत एक जगह और रह गयी वहां भी चलें, जहाँ 5 साल पहले गए थे नकोदर ?. मंजीत जी कहते चलो, जाते जाते गुरदास जी अपने मन में सोच रहे थे कि वह बाबा जी को क्या अर्पित करेंगे, क्यों कि जल्दी जल्दी में उन्होंने कोई प्रसाद भी नहीं लिया था. गुरदास जी ने एक घड़ी बांधी हुई थी जिसमें छोटे छोटे हीरे लगे हुए थे, उन्होंने मन में सोचा कि मैं घडी देदूँगा, गुरदास जी अभी रास्ते में ही थे कि नकोदर में साईं जी के साथ एक लड़का और शरदा जी बैठे थे साईं जी उनसे पूछ रहे थे कि "आपने कभी हीरों वाली घड़ी देखी है ?" शरदा जी बोले आपकी लीला है आप कुछ भी दिखा सकते हो, साईं जी कहते चलो फिर आज फिर आपको हीरों वाली घडी दिखाते हैं. उस समय मंढाली वाले बाबा जी साईं जी को मंढाली के मेले पर आने का निमंत्रण देने आये थे और बोले साईं जी हमारे मेले पर सारे कलाकार आ चुके हैं लेकिन अभी तक गुरदास नहीं आया. साईं जी कहते गुरदास भी आने वाला ही है. मंढाली वाले बाबा जी पूरी बात का पता नहीं था कि साईं जी ने क्या कहा. फिर मंढाली वाले बाबा जी चले गए और गुरदास मान जी दरबार पहुंचे, प्रवेश किया साईं जी का मुँह दूसरी तरफ था, गुरदास जी उनको माथा टेकने लगे तो साईं जी बोले पहले बाबा मुराद शाह को माथा टेक के आ. गुरदास जी ने माथा टेका और साईं जी के पास आकर बैठ गए. शरदा जी बोले,साईं जी गुरदास हमारे पास एक ही बार आया है फिर नहीं आया. साईं जी बोले " यह हमारे पास कहाँ आते हैं यह तो राहु केतु के चक्करों में पड़े हैं" गुरदास जी रोना शुरू हो गए और मन ही मन में बोल रहे थे "मुझे बख्श दो, मुझे बख्श दो " साईं जी अपने मुँह से बोल रहे थे "जा बख्श दिया , जा बख्श दिया". गुरु वही है जो बिना बोले बात जाने. इसीलिए बड़े कहते हैं पानी पीये छान के और गुरु बनाइये जानके. गुरदास जी ने उस दिन देख लिया कि इनसे ऊपर कुछ नहीं, उनको साक्षात् रब की तस्वीर साईं जी में दिखी. साईं जी ने अपनी जेब में से पैसे मुठी भर के निकले और गुरदास जी को दिए और पूछा “मंढाली मेला है, गा जायेंगा ?”. गुरदास जी कहते जो आज्ञा. फिर गुरदास जी जाने लगे तो साईं जी ने आवाज़ लगायी और कहा "घडी" ? गुरदास जी मुस्कुराये घडी उतारने लगे, साईं जी बोले नहीं अपने ही बांधी रख. गुरदास जी कहते नहीं साईं जी आप स्वीकार करो, साईं जी कहते अपने ही बांधी रख, कहते "हाथ पर बांधी और दिल पे बनी एक ही बात है " दिल पे तो बन चुकी थी, गुरदास जी ने फिर निवेदन किया तो साईं जी ने कहा ठीक है फिर बाँध लेते हैं. भगत की बांधी फिर गुरु कैसे छुड़ाए.

साईं जी ज्यादा वक़्त हीर ही पढ़ते थे, वारिस शाह जी वो फ़क़ीर थे जिन्होंने हीर ग्रन्थ लिखा था. जिसको हर फ़क़ीर ने पढ़ा, जिसमे सच्चे इश्क़ के जरिये सीधा रब से जुड़ती तार की बात की गयी है. एक बार साईं जी ने हीर की एक किताब गुरदास मान जी को दी, जिसके पहले पन्ने पर उन्होंने लिखा था "बाबा मुराद शाह जी की अपार कृपा रहेगी - सेवादार गुलाम " साईं जी अपने आप को गुलाम लिखते थे. गुरदास मान जी एक बार जाने लगे तो साईं जी ने वो हीर किताब गुरदास जी को दी और कहा "इसको बीच बीच में से पढ़ना, क्योंकि जिसने पढ़ली हीर वो हो गए फ़क़ीर" फिर एक दिन गुरदास जी रियाज़ कर रहे थे, गुरदास मान जी ज्यादा तर वक़्त हीर ही गाते हैं रियाज़ के समय, तो मंजीत मान जी का फ़ोन आया तो उन्होंने पुछा "हम फिल्म वारिस शाह बना लें ?" गुरदास मान जी ने देखा उनके हाथ में हीर की कीताब खुली थी जिसमे उस समय वही पन्ना खुला हुआ था जिस पर साईं जी लिखा था बाबा मुराद शाह जी की अपार कृपा रहेगी सेवादार गुलाम , गुरदास मान जी वो इशारा समझ गए की यह गुरु का आशीर्वाद है और कहा मंजीत शुरू कर दो.

फिर एक दिन फिल्म के लिए हीर के बैंत रिकॉर्ड करने थे चंडीगढ़ जिसके लिए सुबह 11 बजे का समय रखा गया था. गुरदास जी किसी को बिना बताये सुबह सुबह नकोदर चले गए साईं जी के पास. पीछे सभी को गुस्सा चढ़ गया क्योंकि पहले रिहर्सल होनी थी फिर रिकॉर्डिंग. साईं जी सब कुछ जानते थे जब गुरदास जी साईं जी के पास पहुंचे तब साईं जी ने कहा "गुरदास फ़क़ीर वह होता है जो चाहे सो करे, और जो चाहे सो करावे" गुरदास जी ने आशीर्वाद लीया और चंडीगढ़ पहुंचे. उनको रिहर्सल के लिए कहा और पन्ने दिए जहाँ से देख कर रिकॉर्डिंग करनी थी. गुरदास जी ने बिना रिहर्सल बिना पन्ने पढ़े सारी हीर रिकॉर्ड की, सब देख के हैरान हो गए की उन्होंने बिना देखे सारी हीर रिकॉर्ड कर दी, और जो गया उसको दुबारा गाने की जरुरत नहीं पढ़ी. एक तरह से सारी हीर ही याद करवा दी थी साईं जी ने. फिर जब फिल्म बन गयी सब कुछ हो गया तब साईं जी ने कहा "गुरदास इतने बड़े फ़क़ीर की यादगार बना देना भी बहुत बड़ी बात होती है, रब तेरे ते किरपा करे".